शब्दावली

वे शब्द जिनसे साधना बनी है

अभिलेखागार में बार-बार आने वाले शब्दों की छोटी, सधी हुई परिभाषाएँ — हर शब्द उन निबन्धों से जुड़ा है जहाँ विचार केवल समझाया नहीं, जिया गया है।

A

Advaitaअद्वैत (advaita)

अद्वैत — यह शिक्षा कि परम सत्ता अलग-अलग आत्माओं और वस्तुओं में विभाजित नहीं है।

Ahimsaअहिंसा (ahiṃsā)

अहिंसा — योग का पहला संयम; कर्म से वाणी तक, यहाँ तक कि अपने से बोलने के स्वर तक अहानि।

Anandaआनन्द (ananda)

आनन्द — क्षणिक सुख नहीं, बल्कि वह पूर्णता जो सत्ता के स्वभाव में ही कही गई है।

Aparigrahaअपरिग्रह (aparigraha)

अपरिग्रह — आवश्यकता से अधिक संचय न करने का अनुशासन; पाँच यमों में अंतिम।

Asanaआसन (asana)

आसन — बैठक या मुद्रा; वह शारीरिक स्थिरता जिस पर टिककर अवधान भीतर जा सकता है।

Atmanआत्मन् (ātman)

आत्मन् — शरीर, मन और भूमिकाओं के नीचे वह अपरिवर्तनशील साक्षी जिसकी ओर उपनिषद संकेत करते हैं।

Avidyaअविद्या (avidya)

अविद्या — सूचना की कमी नहीं, बल्कि अपने ही स्वरूप की बुनियादी भूल।

B

C

D

G

I

J

K

M

N

P

R

S

Sadhanaसाधना (sādhanā)

साधना — प्रतिबद्ध, नियमित अभ्यास; वह दैनिक श्रम जिससे आकांक्षा सामर्थ्य बनती है।

Samadhiसमाधि (samādhi)

समाधि — अवधान का ऐसा पूर्ण ठहराव कि अलग द्रष्टा होने का बोध ही विलीन हो जाए।

Samsaraसंसार (saṃsāra)

संसार — बनने-बिगड़ने का चक्र जो जन्मों में — या एक साधारण दिन में — स्वयं को दोहराता है।

Samskaraसंस्कार (samskara)

संस्कार — दोहराए विचार या कर्म से मन में पड़ी लीक, जो आगे के करने को आकार देती है।

Sankalpaसङ्कल्प (saṅkalpa)

संकल्प — हृदय में पूरा बना व्रत, जो एक बार बोकर भरोसे से निभाया जाता है, तर्क से नहीं।

Sankirtanaसङ्कीर्तन (sankirtana)

संकीर्तन — सामूहिक भजन; वह मंडली-गान जिसमें स्वर एक-दूसरे को धारण करते हैं।

Santoshaसन्तोष (santoṣa)

संतोष — अनुशासन के रूप में तृप्ति; सुधार की योजना से पहले, जो उपस्थित है उसकी अभ्यस्त स्वीकृति।

Satsangसत्संग (satsang)

सत्संग — सत्य में बैठक; उन्हीं की संगति जो उसी समझ की खोज में हैं।

Sattvaसत्त्व (sattva)

सत्त्व — स्पष्टता का धागा; वह हल्की, संतुलित अवस्था जिसमें वस्तुएँ जैसी हैं वैसी दिखती हैं।

Satyaसत्य (satya)

सत्य — वाणी और जीवन का यथार्थ से मेल, जिसे अहिंसा कठोरता बनने से रोकती है।

Sevaसेवा (seva)

सेवा — प्रतिफल की आशा के बिना दूसरों के लिए किया गया कर्म।

Shastraशास्त्र (śāstra)

शिक्षा का व्यवस्थित शरीर — ग्रंथ और अनुशासन एक साथ, जो ज्ञान को क्रम देकर सिखाता है।

Shraddhaश्रद्धा (shraddha)

श्रद्धा — वह कार्यशील विश्वास जो निश्चितता से पहले ही अभ्यास को आरंभ कर देता है।

Smaranaस्मरण (smarana)

स्मरण — दिन भर पवित्र को बार-बार मन में लौटा लाने का अभ्यास।

Svadhyayaस्वाध्याय (svādhyāya)

स्वाध्याय — ग्रंथों का अध्ययन और साथ ही उस पढ़ने वाले का अध्ययन — दोनों एक ही अनुशासन।

T

U

V

Y